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मध्यप्रदेश

पाठापुर गांव: एक अनूठा यात्रा पानी की खोज में

पन्ना टाइगर रिजर्व के दिल में बसा पाठापुर गांव एक अनोखी कहानी साझा करता है। यहां के गांववासियों के लिए प्यास बुझाना कोई साधनिक कठिनाई नहीं, बल्कि यह एक अनोखा साहसिक क्षेत्र है। गांव के गहन जंगली परिसर में, करीब एक किलोमीटर की दूरी पर, एक शानदार झरना छिपा है। यहां पहुंचना एक पहाड़ की चढ़ाई को हराने के बराबर है, और रास्ता अजीबोगरीब और कठिन है।

इस झरने का पानी ही गांववासियों के जीवन की रक्षा का स्रोत है। यहां पर पानी की कमी का असर नहीं सिर्फ लोगों के जीवन पर होता है, बल्कि जंगली जानवरों के जीवन पर भी। इस अनोखे पानी स्रोत से बाघ और अन्य जंगली जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं, जिससे ग्रामीणों को उनके हमले का डर सदा रहता है।

यहां के लोगों के लिए जल की कमी को निभाना कोई नई बात नहीं है, यहां के लोगों ने सालों से इस समस्या का सामना किया है। गर्मियों में, जब तापमान 40 से 45 डिग्री के बीच होता है, गांववाले पानी के लिए सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं। एक बार जब पानी का डिब्बा लेकर निकल लिया जाता है, तो पूरा दिन उनका खत्म हो जाता है। इन लोगों का दिन पानी के लिए मेहनत से ही भरा होता है, और रात में भी यही उनकी प्राथमिकता रहती है। इस गांव में किसी ने अब तक हैंडपंप या बोरवेल नहीं देखा है।

बिजावर विधानसभा से 75 किलोमीटर दूर, पाठापुर गांव के लोगों को पानी के लिए दो रास्ते हैं। पहला रास्ता 17 किमी दूर सटई से जाता है, जबकि दूसरा रास्ता बिजावर से 50 किमी दूर है। लोग अब भी झरने से पानी भरने के लिए पर्याप्त मात्रा में संघर्ष कर रहे हैं।

इन दिनों, लोग गांव के नीचे झरने के पास पानी की खोज करने के लिए पहाड़ी से नीचे आ रहे हैं। इस कार्य में महिलाएं भी अपना योगदान दे रही हैं, वे झील के किनारे बने कुंड से पानी ला रही हैं। यह तो सिर्फ गांववालों को ही पानी प्रदान करता है, बल्कि यहां के जंगली जानवरों के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है। गांव की महिलाएं और बच्चे अब तक 1 किलोमीटर चलकर ही झरने तक पहुंचना पड़ता है, तभी उन्हें पानी उपलब्ध होता है।

झरने पर पानी भरने आए गांव के बलीराम राजगौड़ ने बताया कि वह और उनका भाई रोज़ सुबह से शाम तक झरने पर ही बैठे रहते हैं, ताकि उन्हें एक दिन का पानी मिल सके। गर्मी के मौसम में, झरने में पानी की कमी होने से अपनी बारी का इंतजार करने के लिए 2 से 3 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। यहां के लोग एक ग्रुप में साथ मिलकर पानी को रस्सियों के सहारे ऊपर ले जाते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद, वे केवल 14 लीटर के 4 से 6 डिब्बे पानी ही ऊपर ले जा पाते हैं। गांव के बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अब तक 1 किलोमीटर चलकर ही झरने तक जाना पड़ता है।

पाठापुर गांव के अलावा, किशनगढ़ का ही बहरवारा गांव भी पानी की समस्या से जूझ रहा है। यहां के लोग भी पानी के लिए पहाड़ी से रिसने वाले झरने पर आश्रित हैं। जब तक समस्या का समाधान नहीं होता, ये लोग अपनी निरंतर मेहनत जारी रखेंगे, ताकि उनके और उनके पशु-पक्षियों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े।

Janvi Express News

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